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रीतिकाल की प्रमुख विशेषता | ritikal ki pramukh visheshta

रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएं:

1. रीति-बद्धता: रीतिकालीन कविता रीति-बद्धता के लिए प्रसिद्ध है। रीति का अर्थ है “शैली” या “मार्गदर्शक सिद्धांत”। रीतिकालीन कवियों ने अपनी रचनाओं में रीति-शास्त्र के नियमों का पालन किया।

2. श्रृंगार रस: रीतिकालीन कविता का मुख्य विषय श्रृंगार रस है। नायिकाभेद, ऋतुवर्णन, प्रकृति-चित्रण, और नख-शिख वर्णन इस काल की कविता में प्रमुख रूप से मिलते हैं।

3. भाषा और शैली: रीतिकालीन कविता में भाषा और शैली का विशेष ध्यान रखा गया है। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और सुबोध है। शैली में अलंकारों का चमत्कारिक प्रयोग मिलता है।

4. अलंकार-प्रियता: रीतिकालीन कवि अलंकारों के प्रयोग में विशेष रूप से रुचि रखते थे। उत्प्रेक्षा, रूपक, उपमा, यमक, अनुप्रास, आदि अलंकारों का प्रयोग इस काल की कविता में बढ़-चढ़कर किया गया है।

5. कल्पना-शक्ति: रीतिकालीन कवियों की कल्पना-शक्ति अत्यंत समृद्ध थी। उन्होंने अपनी कल्पना से अनेक सुंदर और मनोरंजक चित्रों का निर्माण किया है।

6. प्रकृति-चित्रण: रीतिकालीन कविता में प्रकृति-चित्रण का विशेष स्थान है। कवियों ने प्रकृति का वर्णन बड़े ही मनोहारी ढंग से किया है।

7. नायिकाभेद: रीतिकालीन कविता में नायिकाभेद का विशेष महत्व है। कवियों ने विभिन्न प्रकार की नायिकाओं का वर्णन किया है, जैसे कि अभिसारिका, विरहिणी, स्वकीया, परकीया, आदि।

8. नीति-परक रचनाएं: रीतिकाल में नीति-परक रचनाएं भी लिखी गईं। इन रचनाओं में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर नीतियां दी गई हैं।

9. भक्ति-परक रचनाएं: रीतिकाल में भक्ति-परक रचनाएं भी लिखी गईं। इन रचनाओं में विभिन्न देवी-देवताओं की भक्ति की गई है।

10. रीतिकालीन प्रमुख कवि: रीतिकाल के प्रमुख कवियों में बिहारी, केशवदास, भूषण, मतिराम, देव, आदि शामिल हैं।

रीतिकाल हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण काल है। इस काल की कविता में रीति-बद्धता, श्रृंगार रस, अलंकार-प्रियता, कल्पना-शक्ति, प्रकृति-चित्रण, नायिकाभेद, नीति-परक रचनाएं, भक्ति-परक रचनाएं, आदि विशेषताएं मिलती हैं।

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