Hindi

करुण रस (Karun Ras) – परिभाषा, भेद और उदाहरण

करुण रस संस्कृत साहित्य में नौ रसों में से एक है। यह उस भाव या अनुभूति को दर्शाता है जो हमें दुःख, करुणा और सहानुभूति से भर देता है। यह रस किसी पात्र के दुखद अनुभव, वियोग, हानि या मृत्यु के चित्रण के माध्यम से उत्पन्न होता है।

भेद:

करुण रस के मुख्यतः तीन भेद बताये जाते हैं:

  • आधि-करुण: यह प्रारंभिक दुःख या करुणा का भाव होता है।
  • मध्यम-करुण: यह गहरा होता हुआ दुःख या करुणा का भाव होता है।
  • अन्तिम-करुण: यह चरम पर पहुंचा हुआ दुःख या करुणा का भाव होता है।

उदाहरण:

  • महाभारत में द्रौपदी चीरहरण का वर्णन: द्रौपदी के अपमान और चीरहरण का वर्णन पाठक में करुणा का भाव जगाता है।
  • तुलसीदास के रामचरितमानस में राम के वनवास का वर्णन: राम के वनवास जाने का मार्मिक वर्णन पाठक को राम के दुःख में शामिल कर लेता है।
  • शेखर: शिवराम वर्मा की कहानी: शिवराम वर्मा के बेटे की मृत्यु का मार्मिक वर्णन पाठक को गहरे दुःख में डाल देता है।

करुण रस के सृजन के लिए निम्नलिखित तत्वों का उपयोग किया जाता है:

  • स्थायी भाव: शोक
  • आलम्बन: वह व्यक्ति या वस्तु जिसके कारण दुःख उत्पन्न होता है।
  • उद्दीपन: आलम्बन से संबंधित कोई वस्तु या घटना जो दुःख को और बढ़ा देती है।
  • संचारी भाव: विभिन्न प्रकार के भाव जो शोक के साथ उत्पन्न होते हैं, जैसे क्रोध, भय, निराशा आदि।
  • अनुभाव: शारीरिक क्रियाएं जो शोक को व्यक्त करती हैं, जैसे रोना, विलाप करना, सांस लेने में तकलीफ होना आदि।

करुण रस साहित्य में पाठकों के मन में सहानुभूति और करुणा का भाव जगाकर उन्हें पात्रों के दुःख में शामिल कर लेता है। यह रस हमें जीवन के कठिन पहलुओं के बारे में सोचने और उन्हें समझने में मदद करता है।

Experts Ncert Solution

Experts of Ncert Solution give their best to serve better information.

Leave a Reply

Back to top button